संसाधन एवं विकास / sansadhan evam vikas class-10 notes in hindi

जानने योग्य तथ्य तथा महत्त्वपूर्ण शब्दावली :

1. संसाधन – प्रकृति से प्राप्त विभिन्न वस्तुएँ जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त होती हैं, जिनको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध हैं संसाधन कहलाते हैं।

2.जीव मंडल से प्राप्त संसाधन जैव संसाधन चलाते हैं।

3. निर्जीव वस्तुओं द्वारा निर्मित संसाधन, अजैव संसाधन कहलाते हैं।

4. वे संसाधन जिन्हें विभिन्न भौतिक, रासायनिक अथवा यांत्रिक प्रक्रियाओं के द्वारा पुनः उपयोगी बनाया जा सकता है, नवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं।

5. वे संसाधन जिन्हें एक बार उपयोग में लाने के बाद पुनः उपयोग में नहीं लाया जा सकता, इनका निर्माण तथा विकास एक लंबे भूवैज्ञानिक अंतराल में हुआ है, अनवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं।

6. निजी स्वामित्व वाले व्यक्तिगत संसाधन कहलाते हैं।

7. वे संसाधन जिनका उपयोग समुदाय के सभी लोग करते हैं, सामुदायिक संसाधन कहलाते हैं।

8. किसी भी प्रकार के संसाधन जो राष्ट्र की भौगोलिक सीमा के भीतर मौजूद हों, राष्ट्रीय संसाधन होते है। व्यक्तिगत, सामुदायिक संसाधनों को राष्ट्र हित में राष्ट्रीय सरकार द्वारा अधिगृहीत किया जा सकता है।

9. वे संसाधन जो किसी क्षेत्र में विद्यमान तो हैं, परंतु इनका उपयोग नहीं हो रहा है, संभावी संसाधन कहलाते हैं।

10. वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है, इनके उपयोग की गुणवत्ता तथा मात्रा निर्धारित हो चुकी है, उन्हे विकसित संसाधन कहते हैं।

11. प्रकृति में उपलब्ध होने वाले वे पदार्थ जो मानव आवश्यकताओं की कर सकते हैं। लेकिन तकनीकी ज्ञान न होने या पूरी तरह विकसित न के कारण पहुँच के बाहर हैं, भंडार कहलाते हैं।

12. सतत पोषणीय विकास – इस तरीके से विकास किया जाए जिससे पर्यावरण को हानि न पहुंचे तथा वर्तमान में किए जा रहे विकास के द्वारा पीढ़ियों की आवश्यकताओं की अवहेलना न हो।

13. संसाधन नियोजन – के उपाय अथवा तकनीक जिसके द्वारा संसाधनों का उचित प्रयोग सुनिश्चित किया जा सके।

14. संसाधन संरक्षण – संसाधनों का न्यायसंगत तथा योजनाबद्ध प्रयोग, जिससे संसाधनों का अपव्यय न हो।

15. भूमि निम्नीकरण – विभिन्न प्राकृतिक तथा मानवीय क्रियाकलापों द्वारा का कृषि के योग्य न रह पाना।

16. निवल अथवा शुद्ध बोया गया क्षेत्र – वह क्षेत्र जहाँ वर्ष में एक बार या से अधिक बार कृषि की गई हो।

17. कुल बोया गया क्षेत्र – शुद्ध बोए गए क्षेत्र में परती भूमि को जोड़ना।

18. परती भूमि – वह भूखंड जिस पर कुछ समय खेती नहीं की जाती खाली छोड़ दिया जाता है।

19. बंजर भूमि – वह भूखंड जिस पर कोई पैदावार नहीं होती तथा जो पहाड़ी, रेतीली अथवा दलदली होती है।

20. लैटेराइट मृदा – अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मिट्टी की ऊपरी परत के तेजी से कटाव से निर्मित मृदा।

21. मृदा अपरदन – प्राकृतिक कारकों द्वारा मृदा का एक स्थान से हटना।

22. उत्खात भूमि – प्रवाहित जल तथा पवनों के द्वारा किए जाने वाले मृदा अपरदन से उत्खात भूमि का निर्माण।

मृदा किस प्रकार बनती है?

मृदा के निर्माण और उसकी उर्वरता के विकास के लिए कई कारक उत्तरदायी होते है

(i) सबसे पहला कारक शैल है जिनसे मृदा के लिए उचित सामग्री मिलती है।

(ii) दूसरा प्रमुख कारक जलवायु है जो उन शैलों को एक लम्बी अवधि में छोटे-छोटे टुकड़ों और कणों में बदल देती है।

(iii) तीसरा कारक, पेड़-पौधे हैं जो शैलों में घुसकर अपनी जड़ों से उन्हें तोड़-फोड़ देते हैं।

(iv) चौथे, पशु भी निरन्तर अपने चरने की क्रिया से इन शैलों में अनेक परिवर्तन ला देते हैं।

(v) पाँचवें, ऊँचाई और निरन्तर होने वाली वर्षा भी इन शैलों के छिद्रों में घुसकर तोड़-फोड़ का कार्य करती रहती है।

(vi) छठे, अन्त में एक लम्बे समय तक उपरोक्त अनेक कारकों के क्रियाशील रहने पर इन शैलों के कणों में निरन्तर अन्तर आता-जाता है और धीरे-धीरे मृदा का निर्माण होता रहता है।

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