कन्यादान सारांश Class 10

Kanyadan Summary Class 10

व्याख्या :
प्रस्तुत कविता में मां बेटी को स्त्री के परंपरागत आदर्श रूप से हटकर जीने की सीख दे रही है। कवि का मानना है की समाज व्यवहार द्वारा स्त्रियों के लिए आचरण संबंधित जो प्रतिमा गढ़ लिए जाते हैं वह आदर्श के माहौल में बंधे होते हैं। कोमलता के गौरव में कमज़ोरी का उपहास छिपा रहता है लड़की जैसा ना दिखाई देने में इसी आदर्श ई करण का प्रतिकार है। बेटी मां के सबसे निकट और उसके सुख-दुख के साथी होती है।

कवि ने कन्या विवाह के बाद बेटी को उसके ससुराल भेजते समय मां की अंतर वेदना को दिखाया गया है। मां को आभास होता है कि उसने अपनी बची पूंजी को भी दान कर दिया। उसके पास कुछ भी शेष नहीं बचा है। वह अभी इतनी सयानी नहीं हुई है। वह इतनी भोली है कि सुख की कल्पना तो करती है परंतु जीवन में आने वाले दुखों से अभी अपरिचित है।

मां ने बेटी को विदा करते समय सावधान किया है कि अपने सौंदर्य पर इधर आना मत , सजग रहना और किसी के तारीफ करने में ना उलझ ,कर अपने जीवन को बंद मुक्त रखना। मां समझा रही है कि पानी में अपने सौंदर्य को देखकर इतराने का प्रयास मत करना। इससे आग के समान सावधान रहना।

आग रोटियाँ सेकने के लिए होती है जलने के लिए नहीं अतः सभी कार्य करते समय अति सावधानी बरतना। शाब्दिक भ्रम की तरह अर्थात प्रशंसा आत्मक शब्दों की तरह कपड़ों और गहनों के चक्कर में मत पड़ना । यही भ्रम स्नेह का आभास करा कर बंधन में जकड़े रहेंगे। तुम लड़की की तरह कोमल व्यवहार करना पर सामान्य और कमजोर लड़की की तरह अत्याचार सहने के लिए कमजोर मत देखना। तुम हर तरह के शोषण का हिम्मत से मुकाबला करना।

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