नेताजी का चश्मा सारांश Class 10

Netaji Ka Chashma Summary Class 10

सारांश

इस कहानी के माध्यम से लेखक स्वयं प्रकाश जी ने यह कहा है कि एक भूभाग जो चारों ओर से सीमाओं से घिरा हुआ है वह देश नहीं कहलाता है। स्वयं प्रकाश जी ने कहा कि देश इसके अंदर रहने वाले नागरिकों जीव-जंतुओं, वनस्पतियों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदियों, पहाड़ों आदि सब के मेल से ही एक पूरे देश का निर्माण और विकास होता है। जो व्यक्ति इन सभी से प्यार करने और इन्हें सुरक्षित व समृद्ध बनाने की भावना अपने हृदय में रखता है केवल उसे ही देशभक्त कहा जाता है।

इस कहानी में लेखक स्वयं प्रकाश जी ने कैप्टन चश्मेवाले के जरिए देश के लाखों करोड़ों नागरिकों के इस महत्वपूर्ण योगदान को जीवित व स्पष्ट मूर्ति का रूप दिया है। जो कि अपने-अपने विभिन्न तरीकों से इस देश के निर्माण हेतु महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं। और इस शुभ काम में बड़े नागरिक ही नहीं अपितु छोटे बच्चे भी सहयोग देते हैं।

प्रस्तुत कहानी के प्रारंभ में लेखक ने बताया है कि हालदार साहब जो कि इस कहानी के दूसरे महत्वपूर्ण किरदार है। उन्हें कंपनी के काम से उस कस्बे से होकर जाना पड़ता था। जिससे यह कहानी जुड़ी हुई हैं। वह एक छोटा सा कस्बा था। जिसमें कुछ पक्के मकान एक लड़के और लड़कियों का स्कूल, एक सीमेंट बनाने का छोटा सा कारखाना, दो ओपन एयर सिनेमा घर और एक नगरपालिका का दफ्तर था। अब छोटे से कस्बे में एक नगरपालिका थी तो वह कुछ ना कुछ तो करती ही रहती थी। यह समय-समय पर उस कस्बे का निर्माण कार्य पूरा करती रहती थी, जैसे – शौचालय बनवाना, कभी – कभी सम्मेलन करवा दिया, कभी कुछ सड़कें पक्की करवाना, तो कभी कबूतरों की छतरी बनवा दीं।

नगरपालिका की एक उत्साही प्रशासनिक अधिकारी ने उस कस्बे के एक चौराहे पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी की संगमरमर की मूर्ति लगवाने चाही। क्योंकि इसे बनवाने का बजट बहुत ज्यादा आ रहा था और बोर्ड का शासनकाल बहुत कम बचे रहने के कारण इस मूर्ति को बनाने का काम इस कस्बे के ही एक हाई स्कूल के एक शिक्षक मोतीलाल जी को दे दिया गया। मूर्ति एक महीने में बनकर तैयार कर दी गई। मूर्ति बहुत अच्छी बनी थी। बस एक चीज की कमी छुटी थी मूर्तिकार नेताजी की आंखों पर चश्मा बनाना भूल गया था। उस मूर्ति को देख कर ऐसा लगता था जैसे वह देश के लिए बलिदान की प्रेरणा दे रही हो।

उस कस्बे में आते-जाते हालदार साहब ने जब उस संगमरमर की मूर्ति को देखा उन्होंने कहा वाह भई! ये भी एक अच्छा आईडिया है कि संगमरमर की मूर्ति पर एक असली का चश्मा। पहले दिन हालदार साहब ने मूर्ति पर सचमुच का चश्मा देखा तो बहुत खुशी हुई यह जानकर कि आज भी लोग देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत है।

दूसरी बार जब वह फिर वहां आए तो उन्होंने मूर्ति पर तार के फ्रेम का गोल चश्मा देखा। तीसरी बार भी चश्मा बदला हुआ देखा। वह बहुत हैरान हुए की मूर्ति कपड़े नहीं बदल सकती लेकिन चश्मा तो बदन ही सकती है। तो इस बात के पीछे का राज जानने के लिए इस बार उन्होंने पान वाले से पूछ ही लिया कि नेताजी की मूर्ति पर लगा चश्मा हर दिन बदल कैसे जाता है?

पान वाले ने बताया कि कैप्टन नाम का चश्मा बेचने वाला एक आदमी उस मूर्ति पर चश्मा पहनाता है, और जब उसके किसी ग्राहक को उस तरह का चश्मा लेना हो तो वह उस चश्मे को उतारकर दूसरा चश्मा मूर्ति पर पहना देता है। हालदार साहब तुरंत समझ गए कि कैप्टन को बिना चश्मे की मूर्ति बेकार लगती होगी इसलिए वह चश्मा पहनाता रहता है कभी बिना चश्मे की मूर्ति को नहीं छोड़ता।

फिर हालदार साहब उस पानवाले से यह भी जानने की कोशिश करते हैं कि यह कैप्टन चश्मे वाला क्या नेताजी का कोई मित्र या आजाद हिंद फौज का कोई सिपाही है? पानवाले ने चश्मे वाले का मजाक बनाते हुए कहा की वह तो लंगड़ा व पागल है। वह कैसे फौज में भर्ती हो सकता है। हालदार साहब का चश्मे वाले का इस प्रकार से मजाक बनाया जाना बिल्कुल पसंद नहीं आया। हालदार साहब ने जब सामने से आ रहे कैप्टन चश्मे वाले को देखा तो वह आश्चर्यचकित हुए कि वह एक बूढ़ा मरियल-लंगड़ा सा आदमी यही कैप्टन चश्मे वाला है?

लेखक ने बताया कि हालदार साहब जब दो वर्ष तक उस छोटे से कस्बे से गुजरते रहे थे और नेता जी की मूर्ति पर बदलते हुए चश्मे को देखते रहे फिर अचानक एक बार उन्होंने देखा की मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं था और पान वाले की दुकान भी बंद थी। उस चौराहे की लगभग सारी दुकानें ही बंद थी। अगली बार आने पर भी उन्होंने देखा कि चश्मा मूर्ति पर नहीं था। उन्होंने पान वाले से पूछा तो पता चला कि कैप्टन चश्मे वाला मर गया है। यह सुनकर हालदार साहब दुखी होकर चुपचाप वहां से चले गए।

यह बताते वक्त पान वाले की आंखें भी आंसुओं से भरी हुई थी। उन्हें बहुत दुख हुआ। 15 दिन बाद जब वह कस्बे से गुजरे तो सोचा कि वह नहीं रुकेंगे, पान भी नहीं खाएंगे और नेताजी की मूर्ति की तरफ तो देखेंगे भी नहीं। परंतु चौराहे पर पहुंचते ही उन्होंने आखिर मूर्ति की ओर देख लिया, और उन्होंने देखा कि नेता जी की मूर्ति पर छोटा सरकंडे का चश्मा लगा हुआ था, जो कि छोटे बच्चों ने अपने हाथों से बनाया था।

यह देखकर वह बहुत खुश हुए। देश पर शहीद होने वाले वीरों के लिए छोटे बच्चों की भावना व देशभक्ति पर वह भावुक हो उठे तथा उनकी आंखों में आंसू भर आए।

पाठ परिचय

चारों ओर सीमाओं से घिरे भूभाग का नाम ही देश नहीं होता। देश बनता है उसमें रहने वाले सभी नागरिकों, नदियों, पहाड़ों, पेड़-पौधों, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों से और इन सबसे प्रेम करने तथा इनकी समृद्धि के लिए प्रयास करने का नाम देशभक्ति है। नेताजी का चश्मा कहानी कैप्टन चश्मे वाले के माध्यम से देश के करोड़ों नागरिकों के योगदान को रेखांकित करती है जो इस देश के निर्माण में अपने-अपने तरीके से सहयोग करते हैं। कहानी यह कहती है कि बड़े ही नहीं बच्चे भी इसमें शामिल है।

कवि परिचय

इस पाठ के कवि स्वयं प्रकाश जी हैं। स्वयं प्रकाश जी का जन्म सन 1947 मैं इंदौर (मध्यप्रदेश) में हुआ। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में नौकरी करने वाले स्वयं प्रकाश का न और नौकरी का बड़ा हिस्सा राजस्थान में बीता। फ़िलहाल स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद वे भोपाल में रहते हैं और वसुधा पत्रिका के संपादन से जुड़े हैं।

आठवें दशक में उभरे स्वयं प्रकाश आज समकालीन कहानी के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनके तेरह कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें सूरज कब निकलेगा, आएँगे अच्छे दिन भी, आदमी जात का आदमी और संधान उल्लेखनीय हैं। उनके बीच में विनय और ईंधन उपन्यास चर्चित रहे हैं। उन्हें पहल सम्मान, बनमाली पुरस्कार, राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार आदि पुरस्कारों से पुरस्कृत किया जा चुका है।

मध्यवर्गीय जीवन के कुशल चितेरे स्वयं प्रकाश की कहानियों में वर्ग-शोषण के विरुद्ध चेतना है तो हमारे सामाजिक जीवन में जाति, संप्रदाय और लिंग के आधार पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ़ प्रतिकार का स्वर भी है। रोचक किस्सागोई शैली में लिखी गईं उनकी कहानियाँ हिंदी की वाचिक परंपरा को समृद्ध करती हैं।

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