मनुष्यता प्रश्न और उत्तर Class 10

Manushyata Questions and Answers Class 10

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

प्रश्न 1 – कवि ने कैसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा है?

उत्तर- कवि कहता है कि वह सुमृत्यु है जिस व्यक्ति की मृत्यु के बाद लोग उसे याद करें उसके कार्यों को अपना आदर्श माने, उसके पद चिन्हों का अनुसरण करें वह शरीर से तो नहीं रहता है लेकिन उसके कार्य युगों -युगों तक उसकी यादों के द्वारा जीवित रहते हैं जिसका जीवन अपने लिए नहीं होता है दूसरों की भलाई के लिए होता है वह मर कर भी अमर हो जाता है लेकिन जो व्यक्ति केवल अपने लिए ही जीता है अपने ही हित में लगा रहता है वह मनुष्य नहीं है बल्कि पशु -प्रवृत्ति है मनुष्य तो दूसरों के लिए जीते हैं।

प्रश्न 2 – उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है?

उत्तर-वही उदार व्यक्ति है जिसके जीवन की कथा उसकी मृत्यु के बाद भी पुस्तकों में पढ़ी वह लिखी जाती है और लोग उसका अनुसरण करते हैं जिसकी मृत्यु के बाद लोग उसके द्वारा लिए गए उपकारो के प्रति आभार व्यक्त करते हैं जिसको याद कर लोग नतमस्तक हो जाते हैं जिसका यश पृथ्वी से कभी नहीं मिट्टी है मृत्यु के बाद लोग युगों -युगों तक उसकी यश गाथा का बखान करते हैं जिसकी संपूर्ण विश्व पूजा करता है अर्थात लोग उसको श्रद्धा से नमन करते हैं और हर शुभ काम में जिसका सम्मान करते हैं जो सीमाहीन संसार में अपनेपन का भाव भर दे अर्थात सृष्टि को अपना ही समझे उसमें परायपन की भावना कभी नहीं रहती है।

प्रश्न 3 –  कवि ने दधीचि, कर्ण महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता ‘के लिए क्या संदेश दिया है?

उत्तर-कवि  कहता है कि भूख से व्याकुल रविदेव ने भोजन मिलने पर स्वयं ना खाकर उसके दूसरे भूखे व्यक्ति को दे दिया। दधीचि ऋषि के देवताओं के हित के लिए अपने शरीर की हड्डियां दे दी। राजा उशनर ने कबूतर के प्राण बचाने के लिए भूखे बाज को अपने शरीर का मास काट कर दे दिया। वीर करण ने इंद्र के मांगने पर अपने शरीर के जुड़ा जन्मजात कवच दान कर दिया।महान पुरुषों का उदाहरण देकर कभी यह संदेश देना चाहते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों की भलाई के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है वह सच्चा पूजनीय व सभ्य मानव है। इसलिए दूसरों के हित में सदैव तत्पर रहना चाहिए तभी हम मानव कहलाने के लिए योग्य बन सकते हैं सच्चा मानव वही है जो दूसरों के लिए  प्राण त्यागता हो।

प्रश्न 4 – कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व -रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए?

उत्तर- रहो न भूल के कभी मदांध तुक्षछ वित्त में ।

सनाथ जान आपको करो ना गर्व चित्त में।

अर्थात धन -सम्पत्ति के लिए कभी घमंड नहीं करना चाहिए।और ना ही इस बात पर गर्व करना चाहिए कि आपके पास आपके अपनों का साथ है क्योंकि इस दुनिया में कोई भी अनाथ नहीं है सब उस परम पिता परमेश्वर की संतान है।

प्रश्न 5 – मनुष्य मात्र बंधु है से आप क्या समझते हैं ?स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-हम सभी का परम पिता परमेश्वर एक हैं हम सब उसकी संतान हैं इसलिए वास्तविक रूप में हम सभी भाई -भाई हैं जिस प्रकार संसार में एक माता-पिता की संताने परस्पार भाई -बहन होती हैं उसी प्रकार हम सब एक परमपिता की संताने हैं और आपस में भाई- बहन हैं अब प्रश्न यह है कि जब हम परमपिता की संतान है तो संतान में यह बाहरी भेद क्यों दिखाई दे रहा है इस पर कवि कहता है हम सब अपने अपने किए हुए कर्मों का फल भोग रहे हैं इसलिए कर्मों की  भिन्नता भी निश्चित है जिससे सब में परस्पर भेद दिखाई देता है।

प्रश्न 6 – कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है?

उत्तर- कवि कहता है कि यदि हमें सच्चा मनुष्य बनना है तो आपस में मेल- जोल घटना व टूटना नहीं चाहिए। क्योंकि मेल -जोल से प्रेम आत्मीयता  व अपनापन बढ़ता है प्रेम में शांति तथा संतोष है प्रेम व मेल से रहना ही मनुष्य है कि आपस में मेल जोल घटना नहीं  चाहिए और मतभेद बढ़ना नहीं चाहिए। यदि मतभेद बढ़ेगा तो परस्पर कलह व विवाद होना शुरू हो जाएगा। मतभेद विवाद की जड़ है। जहां पर विवाद होता है वहां अशांति होती है अशांति से भाईचारा खत्म हो जाता है भाईचारा न रहने पर मनुष्यता नष्ट हो जाती है। इसलिए संसार में एक होकर चलने से परस्पर सहयोग की भावना बढ़ती है वही सच्चा मानव है जो सहयोग के साथ काम करके सफलता को प्राप्त करें और दूसरों की सफलता में भी योगदान दें।

प्रश्न 7- व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए ?इस कविता के आधार पर लिखिए ।

उत्तर-कवि के अनुसार वास्तविक जीवन वही है जो दूसरों के काम आ सके। दूसरों का उपकार करते हुए जीवनयापन करने से सच्चे सुख का अनुभव होता है इससे मान सम्मान व क् यश मिलता है ऐसे लोगों की मृत्यु के बाद भी लोग याद करते हैं और जीवित अवस्था में उनका सम्मान करते हैं इससे परम शांति मिलती है अपने स्वार्थ के लिए काम करते हुए जीवनयापन करने को कवि पशु प्रवृत्ति की संज्ञा देता है चरागाह मैं पशु केवल अपना पेट भरने के लिए ही चरता है। यदि मनुष्य भी जीवन भर अपने लिए ठीक काम करता रहे तो उसका जीवन पशु के समान है यह मनुष्य जीवन हमें परोपकार के लिए मिला है इसकी सार्थकता तभी है जब हम दूसरों की भलाई करने के लिए तत्पर रहें परोपकार के कर्म ही हमें पशु से श्रेष्ठ बनाती है अन्यथा हम पशु के स्तर पर आ जाते हैं फिर मनुष्य कहलाने के योग्य नहीं रहते स्वार्थ पशुता है मनुष्यता नहीं।

प्रश्न 8 – ‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहते हैं?

उत्तर-मानव केवल मनुष्य शरीर पाकर मनुष्य नहीं है अभी तो उसने मनुष्यता होनी चाहिए तभी वह मनुष्य कहलाने योग्य होता है कवि के अनुसार मनुष्य कहलाने के लिए उसमें निम्न गुण होने चाहिए। मनुष्य वृत्ति है दूसरों के लिए काम करना इसके विपरीत जो व्यक्ति केवल अपने स्वार्थ के लिए ही काम करता है वह पशु प्रवृत्ति वाला है क्योंकि पशु जंगल में केवल अपने लिए ही चरता है जो व्यक्ति दूसरों के लिए कुछ ना करें केवल अपने लिए करता है वह पशु प्रवृत्ति है और जो अपनी परवाह ना कर दूसरों के लिए जीता है वह मनुष्य वृत्ति वाला है जो दूसरों के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है वह सच्चा मनुष्य है इसके लिए कभी महाराज रतिदेव दधीचि व राजा कर्ण का उदाहरण देता है जिन्होंने मनुष्यता के लिए अपनी अत्याधिक प्रिय चीजें भी अर्पित कर दी। सहानुभूति सबसे बड़ा संपत्ति है संपत्ति है दूसरों के दुख में सुख ई होना वह दूसरे के दुख में दुखी होना सहानुभूति है यही मनुष्यता है। कवि के अनुसार सभी मनुष्य परस्पर भाई -भाई हैं क्योंकि हम सबका परमपिता परमेश्वर एक है हम सब उसी की संताने हैं कवि कहता है कि मनुष्य में परस्पर मेल -जोल होना चाहिए उनमें कभी भी परस्पर  मतभेद नहीं होना चाहिए।

(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए।

प्रश्न 1-सहानुभूति चाहिए महाविभूति है यही वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही विरुद्धवाद बुद्ध का दया- प्रवाह में बहा विनीत लोकवर्ग क्या न समाने झुका रहा?

उत्तर – कवि इन पंक्तियों में कहना चाहता है कि मनुष्य के मन में याद व करुणा का का भाव होना चाहिए यही सबसे बड़ा धन है स्वयं ईश्वर भी ऐसे लोगों के साथ रहते हैं इसका सबसे बड़ा उदाहरण महात्मा बुध है जिसने लोगों का दुख नहीं देखा गया तो वह लोक कल्याण के लिए दुनिया के नियमों के विरुद्ध चले गए इसके लिए क्या पूरा संसार उनके सामने नहीं झुकता अर्थात उनके दया भाव व परोपकार के कारण आज भी उनको याद किया जाता है और उनकी पूजा की जाती है

प्रश्न 2-रहो ना भूल के कभी मदाधा  तुच्छ वित्त में सनाथ जान आपके करो न गर्व चित्त में अनाथ कौन है यहां ?

त्रिलोकनाथ साथ है दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ है।

उत्तर-कवि इन पंक्तियों मैं कवि कहना चाहता है कि भूलकर भी संपत्ति या यश पर घमंड नहीं करना चाहिए । इस बात पर कभी गर्व नहीं करना चाहिए कि हमारे साथ हमारे अपनों का साथ है क्योंकि कवि कहता है कि यहां कौन सा व्यक्ति अनाथ है ईश्वर का साथ सबके है वह बहुत दयावान है उसका हाथ सबके ऊपर रहता है।

प्रश्न 3-चलो अभिषेक  मार्ग में सहस खेलते हुए।    विपति  विधन जो पढ़े उन्हें धकेलते हुए घाटे हेल -मेल हां बड़े न भीननता कभी अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हो सभी।

उत्तर-कवि इन पंक्तियों में कहना चाहता है कि मनुष्य को अपनी इच्छा से चुने हुए मार्ग में सुखी सुखी चलना चाहिए रास्ते में कोई भी संकट या बाधाएं आए उन्हें हटाते चले जाना चाहिए मनुष्यों को यह ध्यान रखना चाहिए कि आपसी समझ ना बिगड़े और भेदभाव ना बढ़े बिना किसी तर्क वितर्क के सभी को एक साथ लेकर आगे बढ़ना चाहिए तभी यह संभव होगा कि मनुष्य दूसरों को उन्नति और कल्याण के साथ अपनी समृद्धि भी कायम करें।

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