स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन प्रश्न और उत्तर Class 10

Stri Shiksha ke Virodhi kutarkon ka khandan Mahaveer Prasad Dwivedi Question and Answer Class 10

अध्याय– 5 स्त्री– शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन

 प्रश्न – अभ्यास

प्र०१. कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने क्या-क्या तर्क देकर स्त्री– शिक्षा का समर्थन किया?

उत्तर– कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने स्त्री– शिक्षा के समर्थन में तर्क देते हुए कहां है कि माना कि भारत में प्राचीन काल में स्त्री पढ़ी – लिखी नहीं होती थी। शायद उस समय स्त्रियों को पढ़ाना आवश्यक नहीं समझा गया हो। लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी है जिस कारण स्त्रियों को पढ़ाना आवश्यक हो गया है। इसलिए उन्हें पढ़ाया जाना चाहिए। जिस तरह हम पुराने नियमों, प्रणालियों आदि को तोड़कर नए रूप अपनाते हैं, उसी तरह स्त्री अनपढ़ रखने की इस पद्धति को भी तोड़कर उसे शिक्षित बनाएं। आजकल लड़कियां लड़के से ज्यादा आगे बढ़ रही है और बहुत से नेक काम कर रही है।

प्र०२. ‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं’– कुतर्क वादियों की इस दलील का खंडन द्विवेदी जी ने कैसे किया है, अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर– ‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं’– कुतर्क वादियों की इस दलील का खंडन करते हुए द्विवेदी जी ने कहा है कि पढ़ने– लिखने में ऐसी कोई बात नहीं है, जिससे अनर्थ हो। अनर्थ तो पढ़ें– लिखो तथा अनपढो दोनों से हो सकता है। अनर्थ के कारण तो और ही होते हैं। वे व्यक्ति विशेष की चाल देख कर भी जाने जा सकते हैं। यदि कोई स्त्रियों को पढ़ाना अनर्थकारी समझे तो दोष स्त्रियों को पढ़ाने में नहीं अपितु उस शिक्षा– प्रणाली में है। इसलिए स्त्रियों को अवश्य पढ़ाना चाहिए। पढ़ना – लिखना पुरुषों के लिए ही नहीं बल्कि स्त्रियों के लिए भी आवश्यक है।

प्र०३. द्विवेदी जी ने स्त्री–शिक्षा विरोधी कुतर्कों का खंडन करने के लिए व्यंग का सहारा लिया है–जैसे ‘यह सब पापी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़ती, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करती।’ आप ऐसे अन्य अंशो को निबंध में से छाँटकर  समझिए और लिखिए।

उत्तर– द्विवेदी जी ने स्त्री– शिक्षा विरोधी कुतर्कों का खंडन करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया है एक स्थान पर उन्होंने एक दलील के विषय में शिक्षा का ही परिणाम है। शकुंतला पढ़ी – लिखी होती तो वह अपने पति के विषय में ऐसी अनर्थ पूर्ण बातें नहीं करती। लेखक ने पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर अत्याचार करने को भी पढ़ाई के व्यंग्यात्मक रूप में लिया है। स्त्रियां पढ़– लिखकर विरोध करें तो वह अनर्थ है और स्त्री शिक्षा के लिए जहर है ,दूसरी तरफ  स्त्रियों पर किए जाने वाले अत्याचार को पुरुषों का सदाचार और पढ़ाई का अच्छा परिणाम बताया जाता है। यह काम पुरुष के लिए तो उचित है तथा वही काम स्त्री करें तो वह अनुचित हो जाती है।

प्र०४. पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना क्या उनके अनपढ़ होने का सबूत है?–पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर– पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना उनके अनपढ़ होने का सबूत नहीं है क्योंकि उस समय सर्वसाधारण की भाषा प्राकृत थी। बौद्ध धर्म का त्रिपिटक जो महाभारत से भी बड़ा ग्रंथ है, प्राकृत भाषा में है, क्योंकि उस समय जनसाधारण की भाषा यही थी। दूसरा कारण यह भी है कि तत्कालीन युग में संस्कृत गिने-चुने लोगों द्वारा ही बोली जाती थी। अतः स्त्रियों और दूसरे लोगों के लिए प्राकृत भाषा बोलने के नियम बना दिए गए।

प्र०५. परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री– पुरुष समानता को बढ़ाते हैं–तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर– परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री– पुरुष समानता को बढ़ाते हो– लेखक का यह कथन पूर्णत: उचित है। जब प्राचीन काल से यह प्रथा चली आ रही है कि जो रूढ़ियां सड़– गल चुकी है उन्हें छोड़ हम आगे बढ़ जाते हैं तो पुरुषों को पढ़ाने और स्त्रियों को न पढ़ाने की मानसिकता को लेकर चलना हमारे शिक्षित होने या स्वस्थ मानसिकता का परिणाम नहीं है। हमें समाज को सभ्य और विकसित करने तथा स्वस्थ विचारधारा से युक्त करने के लिए परंपरा के उन्हीं पक्षों को अपनाना चाहिए, जो स्त्री–पुरुषों दोनों की समानता पर बल देते हैं।

प्र०६. तब की शिक्षा– और अब की शिक्षा–प्रणाली में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।

उत्तर– तब की शिक्षा–प्रणाली में स्त्रियों को शिक्षा से वंचित किया जाता था। शिक्षा गुरुओं के आश्रमों और मंदिरों में दी जाती थी। कुमारियो को नृत्य, गान, श्रृंगार आदि की विद्या दी जाती थी। आज की शिक्षा– प्रणाली में नर– नारी में भेद नहीं किया जाता। लड़कियां भी वही विषय पड़ती है जो लड़के पढ़ते हैं। उनकी कक्षाएं साथ –साथ लगती है। पहले सहशिक्षा का प्रचलन नहीं था। आज सहशिक्षा में पढ़ना फैशन बन गया है। आज पढ़ाई में लड़के और लड़की में प्रतियोगिता होती है, कि कौन सबसे अच्छा अंक प्राप्त करेगा और उचित स्थान लेगा।

प्र०७. महावीर प्रसाद द्विवेदी का निबंध उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है, कैसे?

उत्तर– महावीर प्रसाद द्विवेदी ने प्रस्तुत निबंध के माध्यम से अपनी दूरगामी और खुली सोच का परिचय दिया है। स्त्री को पढ़ना–लिखना, सिखाना, उसको पुरुषों के समान अधिकारों को देने की सिफारिश करना, महर्षि की पत्नियां द्वारा व्याख्यान में बड़े– बड़े विद्वानों की हार दिखाना, शंकुतला तथा सीता द्वारा त्यागे जाने पर अपने पतियों को कटुवचन कहलाना, पुराने नियमों, आदेशो और प्रणालियों को तोड़ने की बात कहना, स्त्रियों द्वारा वेद– मंत्रों का उच्चारण करने का प्रसंग लेखक की दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है।

प्र०८. द्विवेदी जी की भाषा– शैली पर एक अनुच्छेद लिखिए।

उत्तर– महावीर प्रसाद द्विवेदी ने प्रस्तुत विचार प्रधान निबंध में सहज, स्वाभाविक एवं विषयानुकूल भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने व्याकरण और वर्तनी संबंधी नियमों को स्थिर कर भाषा का परिष्कृत रूप प्रकट किया है। तत्सम प्रधान शब्दावली है। संस्कृत के उदाहरणों के माध्यम से लेख में सजीवता गई है।

जैसे–  नृपस्य वर्णाश्रम पालन यत 

स एव धर्मों मनुना प्राणितः

द्विवेदी जी की भाषा में स्पष्टता का भाव है। उन्होंने निबंध में कई जगह ऐसे शब्दों और वाक्यों का प्रयोग किया है जिनसे समाज के लोगों पर करारा व्यंग हुआ है। उनकी भाषा की मुख्य विशेषता व्यंगात्मक है। उन्होंने अपने चूटिले व्यंग्य के माध्यम से समाज के लोगों की वास्तविकता को उकेरा है। जैसे–एम.ए. , बी.ए, शास्त्री और आचार्य होकर पुरुष जो स्त्रियों पर हंटर फटकारते हैं और डंडो से उनकी खबर लेते हैं, वह सारा सदाचार पुरुषों की पढ़ाई का परिणाम है। वे सोचते हैं कि हम पढ़ कर बहुत विद्वान हो गए हैं, तथा स्त्री पर जो चाहे, जब चाहे कर सकते हैं।

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